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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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मोबाइल

मोबाइल

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मोबाइल राजा ने सबके मन पर

अब राज किया है

जो पागल है इसके पीछे

उनका मुश्किल काज किया है..


चलाती है मोबाइल अब दुनिया सारी

हर नए स्मार्टफ़ोन को उनका सलाम है

नादान और बेसुध है कई अब तक

पढ़े लिखो का भी दंडवत इसको प्रणाम है..


रातों की निद्रा उड़ाई इसने

और कार्यक्षमता को कमज़ोर किया

जो बस डूबे रहते इसकीं गलियों में

उनका जीवन नीरस और बोर किया


तकनीक कोई अभिशाप नही प्यारे

समझो तो यह वरदान है

उपभोग सीमित किया तो ज्ञान होगा

वरना हम भी इसके गुलाम है...


बेवजह ही उंगलियां कभी स्क्रीन पर चलती है

ढीले मन की निगाहें इधर उधर फिसलती है

परिवार और यार छोड़ दिये हमनें कब से

सिर्फ़ ऑनलाइन गेमिंग में अब शामे ढलती है..


मोबाइल ने हमको चलाया है

या हम उसे चलाते है

उलझन में है शायद युवा हमारे

इसे नही समझ वो पाते है..


दिल, दिमाग की बीमारियों का खौफ बडा है

अनजाने में यह कैसा फितूर चढ़ा है

स्क्रीन टाइम अब कम नही किया तो

पक्का यमराज हमारे पीछे पड़ा है..


टच स्क्रीन के दलदल में

सैंकड़ो को पिघलते देखा है

रील्स चलाते हुए ही

लाखो क्षण निकलते देखा है..


हम माँ से बिछड़े, बाप से बिछड़े

एक ही छत में हो गए टुकड़े

बैठे है एक ही टेबल पर

मगर है अलग अलग मोबाइल पकड़े


मोबाइल के सफ़ेद प्रकाश ने

रातों को काला किया है

बच्चो और बूढों को भी

बस कतई ठाला किया है..


सृजन क्षमता मिट रही उनकी

आँखों पर पड़ गए काले घेरे है

बालक बिगड़ गया गर तो समझ लेना

ज़िन्दगी में सिर्फ उसके अँधेरे है..


पहले थमाते है मोबाइल खुद उसे

और आज़ादी से अपनी पीछा छुड़ाते है

जब लगती है लत मोबाइल की बालक को

तब सिर्फ  रोते है, मातम मनाते है


मत दो मोबाइल हाथों में उनको

अभी तो अपने साथ खिलाओ न

माता- पिता का ही कर्तव्य है यह

बच्चो को तुम

थोड़ा रचनात्मक बनाओ न...


मोबाइल आपका लत में दुश्मन है

प्यारी  नींद को इसने मारा है

यूँ तो ख़ुद को इतना बहादुर समझते है हम

पर सामने इसके मन क्यों हारा है?


मोबाइल के सन्तुलित प्रयोग का

अब हमको कठोर सन्कल्प करना है

मनोरंजन का माध्यम सिर्फ यह फोन नही

हमें सृजनात्मक विकल्प भी कोई रखना है...


आँखों की चिंता हमको करनी है

और पढ़ाई को भी हमें बचाना है

डिजिटल डिटॉक्स का करके ख़ुदसे वादा

अपना स्वर्णिम भविष्य बनाना है


मोबाइल राजा की कोई प्रजा नही हम

उसके इशारों पर जो चलती है

विवेक रूप में अनुशासन हमारा साथी है

मर्ज़ी से ही इसकीं हर इच्छा संभलती है...


अगर अपनी खूबसूरत आँखों को

बचाने का हमनें इरादा किया है

तो समझना सहज है

मोबाइल से दूरी रखने का

खुद से वादा किया है...


इन खूबसूरत आँखों में पलते है बड़े सपने हमारे

और उन्हीं में छिपी जीवन की बड़ी आस है

इन निगाहों को बचाना बहुत ज़रूरी है इसीलिये


अब हमारा डिजिटल उपवास "है

अब हमारा डिजिटल उपवास "है

मोबाइल की एडिक्शन से बाहर

आने के लिये प्रेरित करती है।


हमारा सुख मोबाइल में नही है,

बल्कि एक व्यवस्थित जीवन शैली में है।

एक ऐसी दिनचर्या जिसमें योग, ध्यान, व्यायाम

स्वस्थ भोजन और अच्छी संगत के साथ उच्च संस्कारो को स्थान दिया जाता है।

सी जीवन शैली में ही हमारी प्रसन्नता के तत्व समाए होते है...


हमें इस बारे में clear हो जाना है, कि मोबाइल वर्तमान समय की ज़रूरत है।

लेकिन हमें उसकी गुलामी नही करनी है। अर्थात अनावश्यक प्रयोग नही करना है।

ध्यान रहें:- स्मार्ट फोन ज़िंदगी का हिस्सा हो सकता है लेकिन यह हमारी ज़िंदगी नही है


जब हम इन सभी बातों का ध्यान रखेंगे तभी

mindless user नही बल्कि mindful user बन सकेंगे...


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