STORYMIRROR

Anupama Gupta

Romance

4  

Anupama Gupta

Romance

मन-पतंग

मन-पतंग

1 min
258

मन-पतंग 

उन्मुक्त

उड़ना चाहता 

ख्वाहिशों के खुले आकाश में,

तुम्हारे प्रेम की डोर ,

जो खींचे ही रहती है मुझे ,

अपनी ओर

और जोड़े रखती हैं,

मुझे धरती से ! 

जो डोर बनकर जुड़ा है ,

यह बंधन ,

मन सदैव ही व्याकुल 

इसे तोड़कर 

स्वछन्द उड़ने को।

लेकिन अक्सर 

यह भूल जाए 

ए मन पंछी नहीं 

जो उड़ पाए स्वयं पंखों से 

ए ठहरा कागज की पतंग ,

जो छू पाए आसमान 

मात्र इसी डोर के साथ ,

जो छूटी डोर 

तो औंधे मुँह गिरना 

ही नियति है..........!


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance