मन-पतंग
मन-पतंग
मन-पतंग
उन्मुक्त
उड़ना चाहता
ख्वाहिशों के खुले आकाश में,
तुम्हारे प्रेम की डोर ,
जो खींचे ही रहती है मुझे ,
अपनी ओर
और जोड़े रखती हैं,
मुझे धरती से !
जो डोर बनकर जुड़ा है ,
यह बंधन ,
मन सदैव ही व्याकुल
इसे तोड़कर
स्वछन्द उड़ने को।
लेकिन अक्सर
यह भूल जाए
ए मन पंछी नहीं
जो उड़ पाए स्वयं पंखों से
ए ठहरा कागज की पतंग ,
जो छू पाए आसमान
मात्र इसी डोर के साथ ,
जो छूटी डोर
तो औंधे मुँह गिरना
ही नियति है..........!

