मन ना भये दस-बीस
मन ना भये दस-बीस
सखी री, मन ना भये---
दस- बीस----
होते तो--- ना जाने-- मैं क्या कर जाती---
----एक मन होता गर,
आकाश जैसा----
तो उसे, निराकार --- निर्विवाद
यूं ही छोड़ देती----
विचरने को----
एक मन होता---- धरती जैसा---
तो धीरज धरकर----
सह लेती---- यह असहनीय पीड़ा,
इक मन जो होता--- सलिल जैसा---
चाहे कितनी हो कठिनाई,
राह अपनी बना ही लेता,
इक मन--- पवन-- समीर
जो होता----
जिसके स्नेहिल स्पर्श को
पाकर- त्याग कर----
सब मोह-- माया---
पंछी सम उड़ जाता,
इक मन होता----
सूरज जैसा----
कि, आग में तप कर भी----
कुंदन सा----
निखर जाता---
डूब कर--- फिर से उदय होता
इक मन होता---
चांद जैसा----
हर आवेग को
सह कर----
सबको शीतलता देता,
पर
सखी! मन तो एक ही है----
जो,हरदम, हरक्षण
बस खोया रहता है----
उसी की याद में----
कुछ और देखना
नहीं चाहता,
कुछ भी सुनना नहीं चाहता,
बस निशि वासर
लगा रहता है----
उसी की धुन में!!!

