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Ashu Kapoor

Romance

4  

Ashu Kapoor

Romance

मन ना भये दस-बीस

मन ना भये दस-बीस

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  सखी री, मन ना भये---

  दस- बीस----

  होते तो--- ना जाने-- मैं क्या कर जाती---

  ----एक मन होता गर,

  आकाश जैसा----

  तो उसे, निराकार --- निर्विवाद 

  यूं ही छोड़ देती----

  विचरने को----

  एक मन होता---- धरती जैसा---

  तो धीरज धरकर----

  सह लेती---- यह असहनीय पीड़ा,

  इक मन जो होता--- सलिल जैसा---

 चाहे कितनी हो कठिनाई,

  राह अपनी बना ही लेता,

  इक मन--- पवन-- समीर 

  जो होता----

  जिसके स्नेहिल स्पर्श को

 पाकर- त्याग कर----

  सब मोह-- माया---

  पंछी सम उड़ जाता,

  इक मन होता----

  सूरज जैसा----

  कि, आग में तप कर भी----

  कुंदन सा----

निखर जाता---

 डूब कर--- फिर से उदय होता

  इक मन होता---

  चांद जैसा----

  हर आवेग को

  सह कर----

 सबको शीतलता देता,

  पर

  सखी! मन तो एक ही है----

  जो,हरदम, हरक्षण

 बस खोया रहता है----

 उसी की याद में----

 कुछ और देखना

 नहीं चाहता,

 कुछ भी सुनना नहीं चाहता,

 बस निशि वासर

 लगा रहता है----

 उसी की धुन में!!!

    

     


     


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