मन में भय सा छा जाता है
मन में भय सा छा जाता है
राह चलूं किस राह चलूं
यह समझ में ना आता है
किसे खुश करूँ किसे नाराज
सोचकर मन में भय सा छा जाता है।
यदि आदर करूँ किसी का
डरता है मुझसे ये समझ सा जाता है
दुःख बताऊं अपना
दूसरों को बताकर मजाक उड़ाता है
सोचकर मन में भय सा छा जाता है।
कम कमाऊ तो गरीब समझता है
गरीब को इज्जत कहाँ मिलता है
गर कमाऊ ज्यादा तो
पैसा वाला कहकर अहंकारी बतलाता है
सोचकर मन में भय सा छा जाता है।
ना करूँ मदद किसी का
तो निष्ठुर बतलाता है
गर करूँ मदद किसी का
मूर्खों में मेरा नाम रखा जाता है
सोचकर मन में भय सा छा जाता है।
मान रखूं बीबी का तो
बीबी का पक्षधर कहलाता हूँ
मात , पिता का मान रखूं तो
बीबी से कड़वाहट हो जाता है
दोनों तरफ से सही रहना हूँ चाहता
पर ये नहीं हो पाता है
सोचकर मन में भय सा छा जाता है।
एक पुरुष होना कठिन है कितना
एक सच्चा भाई होना कठिन है कितना
राम सा पति बनना कठिन है कितना
राम सा पुत्र भी होना कठिन है कितना
सुदामा और कृष्ण जैसा दोस्त हो
ये इस जमाने में हो नहीं पाता है
सोचकर मन में भय सा छा जाता है
सोचकर मन में भय सा छा जाता है।
