STORYMIRROR

Satyendra Gupta

Abstract

4  

Satyendra Gupta

Abstract

मन में भय सा छा जाता है

मन में भय सा छा जाता है

1 min
366

राह चलूं किस राह चलूं

यह समझ में ना आता है

किसे खुश करूँ किसे नाराज

सोचकर मन में भय सा छा जाता है।


यदि आदर करूँ किसी का

डरता है मुझसे ये समझ सा जाता है

दुःख बताऊं अपना 

दूसरों को बताकर मजाक उड़ाता है

सोचकर मन में भय सा छा जाता है।


कम कमाऊ तो गरीब समझता है

गरीब को इज्जत कहाँ मिलता है

गर कमाऊ ज्यादा तो 

पैसा वाला कहकर अहंकारी बतलाता है

सोचकर मन में भय सा छा जाता है।


ना करूँ मदद किसी का

तो निष्ठुर बतलाता है

गर करूँ मदद किसी का

मूर्खों में मेरा नाम रखा जाता है

सोचकर मन में भय सा छा जाता है।


मान रखूं बीबी का तो

बीबी का पक्षधर कहलाता हूँ

मात , पिता का मान रखूं तो

बीबी से कड़वाहट हो जाता है

दोनों तरफ से सही रहना हूँ चाहता

पर ये नहीं हो पाता है

सोचकर मन में भय सा छा जाता है।


एक पुरुष होना कठिन है कितना

एक सच्चा भाई होना कठिन है कितना

राम सा पति बनना कठिन है कितना

राम सा पुत्र भी होना कठिन है कितना

सुदामा और कृष्ण जैसा दोस्त हो

ये इस जमाने में हो नहीं पाता है

सोचकर मन में भय सा छा जाता है

सोचकर मन में भय सा छा जाता है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract