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Satyendra Gupta

Abstract

4.6  

Satyendra Gupta

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मन की बात

मन की बात

2 mins
330


सोचा कुछ मन की बात लिखूं

सोचा कुछ अपनो की बात लिखूं

लिखूँ कुछ अपनी बाते

लिखूँ कुछ अपनी जज्बातें

लिख रहा था और लिखता चला गया

गुजर रहे थे दिन और गुजरता चला गया


वो दिन भी होते है , जब खुश होता है इंसान

वो दिन भी होते है , जब रोता है इंसान

हंसना रोना हमारे आपके बस का नहीं है

रिमोट कंट्रोल तो किसी और के पास है

वो तो वक्त है जो हंसाता और रुलाता चला गया

गुजर रहे थे दिन और गुजरता चला गया।


सोचता हूं वो राजा महाराजा कहा चले गए

सोचता हूं उनके महल क्यू सुने पड़ गए

जहां उनके कदम से राजमहल चहकता था

वो कदम अब क्यू कही खो गए

वो सारे महल अब वीराना बनता चला गया

गुजर रहे थे दिन और गुजरता चला गया


हम जानते है फूल कांटो में ही खिलते है

हम जानते हैं राहों में भी कांटे मिलते है

जीवन इतना आसान नहीं , जितना हम समझते है

हर एक सांस समय के साथ खत्म हो रहे है

वो समय भी आ जायेगा , 

जब सांस भी नही बचेंगे ,सांस लेने के लिए

सांसों की माला खत्म होते चला गया

गुजर रहे थे दिन और गुजरता चला गया।


अंत में जो भी लिखूंगा, सच ही लिखूंगा

सच है की जैसा करोगे वैसा भरोगे

सच है की बबूल लगाओगे तो आम कहा से पाओगे

सच है की जैसी करनी वैसी भरनी

सच है की खुशियां बाटोगे तो खुशियां मिलेगी

किसी को रुलाओगे तो बदले में आंसू मिलेगी

हर दौर गुजर गया और गुजरता चला गया

कुछ मंजिल पा गए अपनी कुछ बाकी रह गए

ये सिलसिला चलता रहेगा और चलता चला गया

गुजर रहे थे दिन और गुजरता चला गया।


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