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Rita Jha

Tragedy

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Rita Jha

Tragedy

मन की अभिलाषा

मन की अभिलाषा

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मेरे मन की बड़ी अभिलाषा है बस एक ही।

कह सकूँ जग को जो मैंने अब तक न कही।‍

करती हूँ प्यार अपनी इस पावन धरती से,

सच्चाई है यही जो आज दिल से निकली।


रोक सकूँ मैं इंशा को करने से इसका दोहन।

धरती पर शोभित हो सदा अपना ध्वजारोहण।

मनमानी करने वालों को आगे बढ़ने से रोकूँगी,

तभी तो खुशहाल होगा चहुंओर जनजीवन।


हो ऐसी अपनी धरती जहाँ भूखा न सोए कोई।

जगाना है अमीरों की मानवता, जो कहीं खोई।

फेंक रहे वो अनाज नष्ट कर कहीं कूड़ेदानों में।

दें उस माँ को जो कई दिनों‌ से बिन निवाले सोई।


सुख सुविधा के लिए जो भरते अपना भंडार।

बदलना है मुझे उनका ऐसा संकुचित व्यवहार।

उनके मन में गरीबों की भलाई का सोच जगे,

तो परिश्रम करने वाले कभी न सोये निराहार।


कुछ कुछ लोगों के बंगलों की है गिनती नहीं।

बिन छत रोड पर सोते लोग ठिठुरते हैं कहीं।

देखें फिर भी न मन में परोपकारी विचार आए,

है अभिलाषा यही कर सकूँ उनकी सोच सही।


ठगे जा रहे लोग,सही अधिकार नहीं सभी हासिल।

गरीबी व पिछड़ापन बाधा बनती, हों चाहे काबिल।

पढ़े लिखों को आज मुझे झकझोर कर जगाना है,

सबको शिक्षादान करें, बचे न कहीं कोई जाहिल।



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