मजदूर - - दो शब्द
मजदूर - - दो शब्द
शरीर से बहता पसीना
वस्त्र भी फटा - झीना
खाने को बासी रोटी
नसीब में कहां है बोटी
मौसम की मार सताती
सर्दी-गर्मी हर बार आती
मेहनत की क्या कीमत,
बेवसी हरदम चिढा़ती
जिन्दगी की घात में,
हर बात में औकात बताती
आखों के देखे सपने,
आधे अधूरे मटमैले से
कुछ सूख गये है
लेकिन अधिकतर गीले से
मेहताब भी उदास सा
कतरा रोशनी प्रकाश का
चिंता क्या करें कल की
खबर नहीं अगले पल की
आंखों में छलकती नमी
फटे अधरों पर पपड़ी जमी
जिस्म को घूरती निगाहें
कौन सुनता है आहें
जिंदगी अभिशाप सी
हवस की शिकार सी
धूल में खेलते बच्चे
बनेगें भारतीय सच्चे
टाट की कोठरी में बंद सी
नालियों से भीनी गंध सी
सपनों का यह अधिकार
पांच साल में नेताओं का प्यार
लेकिन जिंदगी का यथार्थ
दम तोड़ता बेवस पार्थ
न फिर कृष्णा आयेगा
न जिंदगी का महाभारत जिताएगा
हर तरफ लाचारी दीदार है
झोपड़ी को घूरती मीनार है
आदमी आज भी मजबूर है
सच में दिल्ली दूर है
दुनिया बदलने का फितूर है
और कल की तरह आज भी,
वह एक मजदूर है।
