महामारी का दौर
महामारी का दौर
चल रहा महामारी का दौर और कड़कती हुई ये ठंड,
और सफर से दूर चला आ रहा कोई अनजान मुसाफिर,
देख हाल शहरों का जल्दी घर पहुंचना हो गया जरूरी,
जल्दी से बढ़ रहे कदम कहीं संग ना ले जाए बीमारी,
कड़कड़ाती ठंड, कांपता हुआ शरीर, हाथों को दबाए,
मुंह पर मास्क पहने चला जा रहा अपने घर की ओर,
तभी कुछ दूर कहीं रोने की आवाज सुनाई दे रही थी,
पास जाकर देखा घर पर बीमारी दिखाई दे रही थी,
रोती और बिलखती हुई लाचार पत्नी तड़प रही थी,
पड़ोसी कोई मदद को ना तैयार दुनिया ऐसी सो रही थी,
सोचा जाकर पूछ लिया जाए क्या इनकी समस्या है,
कदम बढ़ चले घर की तरफ जहाँ आवाज गूंज रही थी,
आखिर जाकर पूछ लिया क्यों तुम इतना रो रही हो,
औरत की करुण भरी आवाज सुनकर दिल रो पड़ा,
अपने प्रियवर की सांसो को सामने निकलते देखा,
कुछ ना कर पाई ऑक्सीजन के लिए तड़पते देखा,
अब अकेले क्या कर पाएगी वो लाचार इस संसार में,
छोड़कर चला गया था वो एक मासूम इस संसार में,
सुनकर उस घर की असहनीय पीड़ा दिल रो रहा था मेरा,
आंखें भर आई जबकि न कोई रिश्ता था उनसे मेरा,
उस मासूम उस नन्हीं सी जान की फिक्र हो रही थी,
जिसने पिता के प्यार को ठीक से महसूस भी नहीं किया,
इस महामारी न जाने कितनों को अनाथ कर दिया है,
अपनों को ही अपनों से दूर कर कितना मजबूर किया है,
हाय रे इंसानियत यहाँ से कहाँ चली गई,
हमें कितने ही हृदय विदारक दृश्य दिखा गई!!
