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Bhawana Raizada

Tragedy

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Bhawana Raizada

Tragedy

मेरे मन की थाह

मेरे मन की थाह

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मेरे मन की थाह न जाने कोई

आँचल से खेली,

आँगन में दौड़ी,

रुनझुन मेरी पायल,

मीठी बोली बोली,

बाबा की लाड़ली,

माँ की दुलारी,

कहते परायी मोती माला में पिरोई।


मेरे मन की थाह न जाने कोई

मुझसे रौनक जहाँ की,

मैं रंग भरी रंगोली,

सबके दिल की धड़कन,

मैं खुशियों की टोली,

मुझसे बहार सत रंगी,

इंद्रधनुषी छटा निराली।

फिर परायी कह के छेड़े हर कोई।


मेरे मन की थाह न जाने कोई।

बन बहू चली आयी,

नया घर सजाने,

प्यार से जाने मैंने,

हर रिश्ते अनजाने,

सबको सिर माथे रख,

जब लगी अपनाने,

परायी समझ उल्हाने देने लगे हर कोई।


मेरे मन की थाह न जाने कोई।

सबका सुख समझा,

दुख को किया नकाम,

सबका साथ विकास,

दिन रात किया हर काम,

मुझ परायी ने सबको,

अपना मान कर किया प्रणाम,

पर मुझको अपना न जाने कोई।

उलझी उलझी बातें न समझे कोई

मेरे मन की थाह न जाने कोई।


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