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Mahendra Kumar Pradhan

Romance

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Mahendra Kumar Pradhan

Romance

मेरे इश्क का दर्द

मेरे इश्क का दर्द

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जब पढ़ता था हाईस्कूल में

तेरे नाम से मुझे

दोस्त मेरे

रिझाने लगे थे।


तब तुम्हें सोचता ना था,

पढ़ता था निरंतर

पर होने लगा असर

जैसे बोर्ड परीक्षा

होने लगा निकटतर।


परीक्षा खत्म

गर्मी छुट्टी

अब उन रिझानो का

मुझे होने लगा असर।


वहीं से होने लगी उसकी

यादों में रमण ,

विरही प्रेमी सा

करने लगा स्मरण।


ये इश्क का नज़ारा

ही था ऐसा ,

एक झलक को उसकी

मैंने तरसा।

वक्त आया


दो दो चार हुई आंखें

प्रेमपत्र में भावना मिलीं

ख़त ख़त में शादी और

गोद में बच्चे खेली।


ये सारे भावनाएं और सपने

टूट गए सारे अपने।

कुछ साल बाद जब

शादी तेरी तय हुई कहीं और

मैं बना प्रेमी पागल


बन देवदास चारो ओर,

दर्द हुआ सुनकर

लोगों का बदनाम

जबकि कभी ना की थी हमने

जिस्म का बदनाम।


देह पवित्र थे, हृदय मिले थे

मनमंदिर में प्रीत खिले थे।

तुझसे जुदाई झेल गया

पर झेल नहीं पाता हूं

मेरे इश्क का बदनाम।


कहने वालों मेरी हाय लगे

जिन्होंने की मेरी पवित्र प्रेम की

यूं ही अपमान।


हायरे समाज !

सिर्फ बाहरी दृष्टि से इश्क का

बदनाम ना करना।

इश्क में दर्शन है राधाकृष्ण की

अपमान ना करना।


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