मदद
मदद
अलसुबह फ़ोन की घनघनाहट से।
ऋचा अधखुली आंखों से फोन उठाई।।
दूसरी तरफ से बच्ची की।
सुबकियों की आवाज आई।।
आंख मल के देखा उसने।
उसकी जेठानी का नंबर था।।
सवाल लिए मन में उसने ।
रोने का कारण पूछा।।
बच्ची ने रोते हुए बताया ।
मम्मी शायद बेहोश हो गई है ।।
दर्द से चिल्लाई थी अचानक।
और फिर खामोश हो गयी है।।
अनजानी आशंका से उसने ।
जल्दी से अमन को जगाया ।।
जाने क्या हुआ है भाभी को।
गुड़िया का कॉल है आया ।।
बदहवास से हो के दोनों ।
उस घर की और भागे।।
पहुंच के देखा तो पाया।
देर हो गई आते-आते।।
भैया के बाद अब भाभी भी।
परलोक गमन कर बैठी।।
अपने पीछे मासूम बच्ची को।
निर्मोही अनाथ कर बैठी।।
रो-रो के गुड़िया का अब।
बहुत ही बुरा हाल था।।
क्या होगा उसका और कैसे होगा।
दिमाग में सबके ये सवाल था।।
अमन ने कहा गुड़िया की।
परवरिश हमारी जिम्मेदारी है।।
ये सुनकर ऋचा का दिमाग घुमा।
बोली पहले ही कौन सी मजेदारी है।।
जो अब एक और बच्चे का।
पालन मुझे करना होगा।।
सुन लो कान खोलकर अभी।
किसी कीमत पर ये ना होगा।।
फिर जरा देर बाद वो।
गुड़िया से जा के लिपट गई।।
बोली चिंता ना करना बेटा।
जिंदा है चाची तुझे छोड़कर नहीं गई।।
अब से तेरी जिम्मेदारी का ।
बेटा हर फर्ज मैं निभाऊंगी ।।
अपने बेटे की तरह पालूंगी ।
तुझे बहुत काबिल बनाऊँगी।।
गदगद था अमन ये देखकर ।
की ऋचा को समझ आ गया।।
देर हुई जरा सी मगर।
सुबह का भुला घर आ गया।।
प्यार से उसने ऋचा और गुड़िया को।
अपने गले से लगा लिया।।
देख कर वो मंजर।
हर किसी का गला भर्रा गया।।
शुक्रगुजार हूँ तुम्हारा मैं।
जो इरादा अपना बदल दिया।।
मेरे भाई-भाभी की निशानी को।
तुमने अपना आँचल दिया।।
मुस्कुरा के बोली वो।
फ़ायदे का सौदा कैसे जाने देती।।
सोचो अब भाभी की जायदाद को।
किसी और के हाथों कैसे जाने देती।।
बस चंद साल में इसे ब्याह कर।
इसके घर विदा कर देंगे।।
और फिर उस संपत्ति का ।
पूरा हक हम जमा लेंगे।।
सुनकर मंसूबे ऋचा के।
अमन का सिर चकराया।।
क्यों अचानक हुई मेहरबां।
बुद्धू को अब समझ आया।।
बिना मतलब के आजकल।
कौन मदद का हाथ बढ़ाता है।।
इस स्वार्थी दुनिया में सच है।
बस मतलब ही रिश्ते चलवाता है।।
बस मतलब ही रिश्ते चलवाता है।।
