STORYMIRROR

Brijlala Rohanअन्वेषी

Romance

4  

Brijlala Rohanअन्वेषी

Romance

मैं

मैं

1 min
415

मैं नहीं नहीं ! मैं कहीं नहीं !

सच्चे दिल से जहाँ ,ढूंढोगी मुझे पाओगी खड़ा वहीं ।

मैं तुम्हारे सपने में भी ,तुम्हारा हकीकत भी 

मैं तुम्हारे ख्यालों में भी ,ख्वाबों में भी ।

मैं तुम्हारे दिल के अंदर ही तो बसता हूं।

बाहर मैं तुमसे हूं ही नहीं ।

मैं सुबह की सूरज की किरण बनकर रोज दस्तक देता हूं ,

तुम्हें जगाने के लिए 

रोज की धूप के टुकड़े ये तुम्हें संदेश देती है कि -

वो दिन दूर नहीं जब हमारी ये दूरियां            

इतनी ही निष्ठा से करीबियां बनकर आएंगीं ।

शाम को वो आकाश में चमकता सितारा मैं ही तो हूं ,

जो तुम्हें एहसास कराता रहता हूं कि मैं कभी दूर तुमसे गया ही नहीं कभी 

मैं वही सितारा हूं जो कभी तेरे माथे की बिंदी बनकर तेरे मुस्कान की शोभा बढ़ाऊँगा ।

तो बताओं मैं कभी तुमसे दूर हुआ था ।

न कभी दूर होऊँगा ।

क्योंकि मैं तुम्हारा सपना नहीं हकीकत हूं ।

अपना हूं और अपने कभी अपनों से दूर रहकर भी दूर नहीं जा पाते ।

  



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance