मैं
मैं
मैं कभी नाम-यश-कीर्ति के पीछे भागता नहीं
मैं तो अपने कर्मयोग को तवज्जो देता हूँ !
अगर कभी मेरे मन में संदेह उत्पन्न हो,
तो मैं अपनी कर्मदिशा ही बदल देता हूँ।
मैं इतना संकीर्ण नहीं कि अपनी ही बात करूँ !
मैं तो दुसरों के बारे में सत्चिंता करता हूँ !
इस शिक्षा-सेवापथ के पग-पग पर
मैं हर पल नई उम्मीदें पैदा करता हूँ
मैं कभी क्षणभंगुर मनोदशा के वशीभूत
कोई निर्णय नहीं लेता
मैं किसी समालोचना से अपना विकास
नहीं रोकता।
मैं इतना भी कमज़ोर नहीं
कि हर किसी के विचारों से
अपना विश्वास कम करूँ !
मैं अपना अस्तित्व सुरक्षित रखता हूँ !
मैं अडिग-अटल-अदम्य हूँ !!
मैं स्वयं को पहचानता हूँ।मैं अपने सीने में
हिमालय-सा आत्मबल रखता हूँ
मैं अपने हृदय में पावन
गंगाधारा प्रवाहित करता हूँ
मैं स्वच्छ-सलिल-चंदन-सा
प्रशांति रखता हूँ
मैं सदैव आत्मसत्ता को
गौरवान्वित करता हूँ
हाँ, मैं स्वाभिमानी हूँ, मगर
दंभपूर्ण स्वार्थी तत्वों से
कतई प्रभावित नहीं !
