मैं पंकज प्रभात
मैं पंकज प्रभात
मैं पंकज प्रभात यूँ अकेला थोड़ा खोया सा,
अपनी यादों में डूब कर कुछ हँसता हुआ,
हर गली हर चेहरे से होकर गुजरता हुआ,
एक रात पर आकर थोड़ा ठहर सा जाता हूँ।
एक चेहरा जिसने कुछ शर्मा कर कुछ घबरा कर देखा था,
दो आँखें जिसने पलको को झुका कर कुछ कहा था,
उन होंठों पर कुछ रुके से सवालों की लाली,
मेरे बातों में खुद का नाम ढूँढती हुई,
मेरे रंग में रंगी हुई, मेरे नाम से सजी हुई,
मेरे इंतेज़ार में भीगी हुई शिखा को पाता हूँ,
मैं पंकज प्रभात एक रात पर आकर थोड़ा ठहर सा जाता हुँ।

