मैं मय में था
मैं मय में था
मैं मय में था मयखाने पहुंचा
दिल से टूटा इसी बहाने पहुंचा
मधुशाला ने पूछा तुम तो आते नही यहाँ
फिर कैसे ये शख्स यहाँ पहुँचा ?
मैंने कहा अभी तक प्यार नही हुआ तुझसे ;
सुन री पगली 'मधुशाला'
तुझसे दिल लगाने तेरे द्वारे आ पहुंचा
मैं मय में था मयखाने पहुंचा
रोज गुजरता था तेरे दर से
तुझको मैं पगली कहता था
सोचा करता था मैं,
क्यूँ इतना तू बर्बाद करे है
फिर भी लोग तुझे ही प्यार करे है
अब जब दिल की चौखट पे ठुकराया गया
मैं भी तेरे दर पर आ पहुंचा
मैं मय में था मयखाने पहुंचा
तेरे प्यालों को होठों से लगा के
चुम्बन में करता रहता
तू 'मधुशाला' कितनी अच्छी
एक भी बार तू न, न कहती
सुन री पगली अब तुझसे प्यार हुआ
तेरा जाम लगाने अब तेरे दर पे आ पहुंचा
मैं मय में था मयखाने पहुंचा
तरस आ गया उसको मुझ पर
जो खुद ही मय में डूबी रहती
कहती है क्या हुआ तुमको मेरे आशिक
क्यों इस तवायफ से ही तेरी प्यास है बुझती
मैंने कहा सुन री पगली
जिसको चाहा वो न रही अपनी
नशा वफ़ा का था मुझमें उसके लिये
मगर वो बेवफा हो गयी हर पल के लिये
तू तो कितनी अच्छी है पगली
तू तो मुझसे वफ़ा है करती
नशे में 'हेमू' चाहे हो जितना
तब भी तो मुझको अपना दीवाना कहती
उस बेवफा से तो तू ठीक तवायफ
कम से कम तू तो मेरे जिस्म से लगती
तेरे इन प्यार की बूंदों को 'मधुशाला'
पीने आ मयखाने पहुंचा
मैं मय में था मयखाने पहुंचा
दिल से टूटा इसी बहाने पहुंचा।

