बिगड़ेगा क्या अब?
बिगड़ेगा क्या अब?
कुछ कहो हम खुश हो रहे हैं
एक नया पाठ हम गढ़ रहे हैं
बनाई हैं हमने कश्तियां कागज की
कुछ नया लेकर हम चल रहे हैं
शाम होते- होते हम पहुंच जायेंगे
परिंदों की तरह आज हम उड़ रहे हैं
बैठा है कोई राह में आज भी मगर
हम काफिरों सा दर- बदर भटक रहे हैं
उनके चेहरे की मुस्कान न फीकी पड़े
जोकर बन हम तो तमाशे कर रहे हैं
बिगड़ेगा क्या अब, जब कुछ रहा ही नहीं
बन भिखारी मुस्कुरा के रह तो रहे हैं
लवविवेक मौर्या प्रणय
