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Bharat Jain

Abstract

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Bharat Jain

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मैं भूल गया

मैं भूल गया

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जब सुनते सुनते मन फूल गया

मैं कहते कहते कुछ भूल गया।


जो कागज़ पढ़ना सीख गया

फिर क्या पढ़ने स्कूल गया।


जब जब न पीछे लौट सका

तो में घर का रास्ता भूल गया।


कब किस सपने में मिले थे हम

शायद इस सपने में भूल गया।



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