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Bharat Jain

Abstract

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Bharat Jain

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वहां हर कोई

वहां हर कोई

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तू भी था मैं भी था और वो भी तो था,

वहाँ हर कोई हमारे जैसा ही तो था।

 

वहाँ न तुलसी, न चंदन, ना ही राम थे,

आज का ये संगम अधूरा ही तो था।

 

अगर तुम न मिलते तो खो गए होते

मेरा पता सिर्फ़ तुम्हारे पास ही तो था

 

वक्त ने वो चमक छीन ली चेहरे से,

वरना ये सारा शहर दीवाना ही तो था।

 


 


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