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Aishani Aishani

Tragedy

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Aishani Aishani

Tragedy

मैं आती रहूँगी तट पर तुम्हारे

मैं आती रहूँगी तट पर तुम्हारे

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ऐ नदी...! 

कहीं मैं

सच में

पागल तो नहीं..? 

कभी गंगा- यमुना सी प्रकट

तो कभी

सरस्वती सी गुप्त! 

और मैं... 

तट पर

कमाल है...! 

मैं... 

दर्द समेटती हूँ

और

तुम बटोर लाओ

दामन भर खुशियाँ...! 

पर... 

जीवन का वरदान

कभी मत देना

थक गई हूँ

चलते चलते। 

ऐ नदी...! 

अब इंतज़ार है तो

बस... 

उस क्षण का

जब महाप्रयाण हो...! 

हाँ... 

मैं आती रहूँगी

तुम्हारे तट पर

कि... 

फिर फिर

लौट जाने के लिए...! 



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