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Varsha Divakar

Classics

4  

Varsha Divakar

Classics

मायका.....

मायका.....

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हाथों से ग्लास अक्सर छुट सा जाता है.... 
दिखने में नॉर्मल.... पर मन बड़ा घबराया हुआ सा रहता है
जब चलती हैं  घर मे शादी की बात मेरी..... 
दिल सौ की स्पीड में भागता रहता है..... 

ढूँढती हैं अक्सर ये आँखें....... अपने सपनो की मंजिल
पर इन आँखों को पता नहीं......... मंजिल तो मिल जायेगी.......पर अपनों से दूरी बहुत बढ़ जायेगी.... 

चूमकर माथा मायके मे मां जगाती है सुबह.....
चार बाते सुनाकर ससुराल में जगायेंगे सुबह
फूल सी सीरत लिये चलते थे आंगन मे माँ के 
ससुराल मे वही फूल मुरझाये नजर आयेंगे  



एक नाजुक सी फूल मैं अपने आंगन की... 
पराये  घर का सम्मान बनके जाना है.... 
सोचती हूँ मैं अक्सर यही..... 
मायका का फूल.... ससुराल में सबको कांटा नजर क्यों आती है  .......... 



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