STORYMIRROR

मानव सिंह राणा 'सुओम'

Classics

4  

मानव सिंह राणा 'सुओम'

Classics

मेरे पिताश्री

मेरे पिताश्री

1 min
254

मेरी दुनिया, मेरा हर पल खास बनाते रहते हैं।

हर पल मुझ पर रखते दृष्टि , आधार है मेरे पिताश्री।


तब चूते छप्पर से हमें बचाकर खुद जगते थे रातों में ।

अब घर की नींव, दीवारें सब कुछ , अपार हैं मेरे पिताश्री।।


कभी मेरे खर्चों का बटुआ , कभी डांट का सार बन गए ।

स्नेह हृदय से करते हमको , डर भी कभी अपार है पिताश्री ।


दफ्तर में सब आप से पूछे कैसे काम ये होगा अब ?

आज तलक चर्चा में रहते , अलौकिक उपहार हैं पिताश्री ।


जब भी किसी को जरूरत पड़ती लग जाते हैं तन मन से

गांव भरे की मदद है करते , प्रभु का उपकार हैं पिताश्री।


डील डौल में उनके जैसा गांव भरे में कोई नहीं।

व्यक्तित्व अनूठा , लंबे ऊंचे कद्दावर है पिताश्री


जब जब नजर नहीं कुछ आता, सोचों में होता हूं मैं

तब तब जीवन में मेरे तुम ही समाधान हैं पिताश्री।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics