STORYMIRROR

ARVIND KUMAR SINGH

Abstract

4  

ARVIND KUMAR SINGH

Abstract

मास्क की मर्जी

मास्क की मर्जी

1 min
309

काल चक्र की कालिख ने

इंसानों को आकर घेरा है

उम्मीद की कोई किरण नहीं

बस चारों तरफ अंधेरा है


हवाओं में उड़ना थम गया

पहियों की रफ्तार रोक दी

आशमा लागे झुका झुका

धरती की चाल भी टोक दी


सींखचों में अपनी मर्जी से

बैठे मौत को आते देख रही

दुनिया थी कल तक ऐंठ में 

खुदगर्जी को जाते देख रही


इंसानी करतूतों ने अपने ही

पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है

कुदरत से खेल किया हरदम

जो पड़ गई खुद पर भारी है


ईर्ष्या, द्वेष व नफरत की

खुल गई हो जैसे गठरी है

पापों की काली परछाई

महामारी बन के पसरी है


अश्क तो सूखे कोरों में

चीखों ने चुप्पी साधी है

छोटे से मास्क की मर्जी पर

देखो जीवन डोर बांधी है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract