मास्क की मर्जी
मास्क की मर्जी
काल चक्र की कालिख ने
इंसानों को आकर घेरा है
उम्मीद की कोई किरण नहीं
बस चारों तरफ अंधेरा है
हवाओं में उड़ना थम गया
पहियों की रफ्तार रोक दी
आशमा लागे झुका झुका
धरती की चाल भी टोक दी
सींखचों में अपनी मर्जी से
बैठे मौत को आते देख रही
दुनिया थी कल तक ऐंठ में
खुदगर्जी को जाते देख रही
इंसानी करतूतों ने अपने ही
पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है
कुदरत से खेल किया हरदम
जो पड़ गई खुद पर भारी है
ईर्ष्या, द्वेष व नफरत की
खुल गई हो जैसे गठरी है
पापों की काली परछाई
महामारी बन के पसरी है
अश्क तो सूखे कोरों में
चीखों ने चुप्पी साधी है
छोटे से मास्क की मर्जी पर
देखो जीवन डोर बांधी है।
