ग़ज़ल
ग़ज़ल
ऐ यार हम मोहब्बत की दुकान में मर गए,
तुम्हें दिल दे कर हम इस जहान में मर गए,
एक जोड़े ने धर्मों की ज़ंजीर क्या लांघी,
चार लोग फिर हिन्दू-मुस्लमान में मर गए,
कोई अपना खड़ा था दुश्मनों की शख में,
हमारे तीर फिर सारे कमान में मर गए,
हमें तीरगी में रहने की आदत क्या पड़ी,
दिल के अँधेरे घर के रोशन-दान में मर गए,
तुझे भूलने की ज़िद से हम खुद से लड़े फिर,
और आखरी समय में तेरे ध्यान में मर गए,
एक जुगनू ने चमक कर निशा जग मगायी,
सितारे फिर जल के आसमांन में मर गए !
