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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

Abstract

सफर में

सफर में

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मनुष्य सफर में है

दिलचस्प नजारे हैं

हवा उड़ाये लिये जा रही है

उसके आस पास का

हर वो सामान जो

उसके हित में नहीं है

और जिसकी जड़ें

बहुत गहरी हैं

तो प्रचंड आंधी में

उखड़ उखड़ कर

गिरते हुये पेड़ों की तरह

उसके रास्ते के

अवरोध हटा रही है

मंद मंद बहती हुई हवा।

लग रहा है

आदमी को घेरे हुये विचार

बरस रहे हैं पानी की तरह

और आदमी

विचार विहीन होता जा रहा है।

सफर के सिलसिले में ही

एक झलक

मिलती रही है और फिर

ओझल हो जा रही है कि

विचार विहीन आदमी

मनुष्यता के आधार पर खड़ा है

जैसे एक विचार शेष है

की हम मनुष्य हैं।


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