आत्म विस्मृति
आत्म विस्मृति
शायद ये आत्म विस्मृति है,
जो इतने चक्कर देती है ।
कातर मानवता भीख देखकर,
हाथ पसारे लेती है!
क्यों भूल गया हे मानव!
तू अपना पौरुष, अपना संबल,
गिरतों को उठा और आगे बढ़ा,
औरों को बता और खुद भी सम्भल।
सब कमजोरी अपनी ही है
पर हम स्वीकार करें कैसे?
पाले जो जूठे अहम सदा ,
अब उनको दफन करें कैसे?
हमने सदैव सिद्धांतों के
उलटे ही अर्थ निकाले हैं।
अपना केवल एक स्वार्थ सधा,
सौ स्वार्थ अन्य के पाले हैं।
अविरोध बढ़ाता है केवल,
अन्यायी की जालिम शक्ति।
मिथ्या भ्रम में फंसकर ही हम,
करते हैं सदा उसकी भक्ति।
दुर्बलता का आकर्षण है,
जो बैरी को उकसाता है।
अन्याय और दुर्बलता का
आपस में गहरा नाता है।
