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nirmala tyagi

Inspirational

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nirmala tyagi

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कुसुम सम सी एक काया

कुसुम सम सी एक काया

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कुसुम सम सी एक काया गगन जिसने थरथराया।

संसनी सी धरा पर क्रांतियों का ज्वार आया।

कुसुम सम सी एक काया गगन जिसने थरथराया।


टेक लाठी जब निकालता साथ हिन्दुस्तान चलता।

नट किया वह आम्लपल सब जिसमें सारा जग डराया।

कुसुम सम सी एक काया गगन जिसने थरथराया।


आज बापू है ठगा सा, अपनों के हाथों बिका सा।

ताकता है गली कूंचे कैसा ये मंजर है आया।

कुसुम सम सी एक काया गगन जिसने थरथराया।


मार्ग में शत रश्मियां थी जो नहीं मैंने चुनी थी।

थी चुनी बस आधी धोती, तन को जिसने जगमगाया।

कुसुम सम सी एक काया गगन जिसने थरथराया।


जिद नहीं मानी हरी की, जिद मुझे बस थी सभी की।

मैंने सोचा था सभी का, हरि का ना रास आया।

कुसुम सम सी एक काया गगन जिसने थरथराया।


वंश मेरा है छुपा सा नाम गांधी पर बिका सा।

है खड़ी अट्टालिकाएॅ, घर है मेरा झोपड़ा सा।

कुसुम सम सी एक काया गगन जिसने थरथराया।


क्या मेरा रास्ता गलत था, ना मेरा दर्शन गलत।

है गलत वो समझ जिसने इसका उल्टा अर्थ पाया।

कुसुम सम सी एक काया गगन जिसने थरथराया।


ठहर लो फिर मेरे बच्चों, मर्म जीवन का ये समझो।

दिया जिसने वो रहा, जिसने लिया वो रह ना पाया ।

कुसुम सम सी एक काया गगन जिसने थरथराया।


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