मानव
मानव
ईश्वर की अद्भुत सृष्टि में देखा है मैंने वह अनूप ,
देखा धरनी का अमर पुत्र, उसकी महिमा आभा व रूप।
संसार रचा जिस शक्ति ने, हर नियम निराला है उसका,
अनगिनत किए निर्माण मगर, निर्माण यह आला उसका
बस हाड़ मांस का एक पुतला ,सद् अर्थों में ना मानव है,
जो जितने अंशों में चेतन, उतने अंशों में मानव है।
मानव है नाम चेतना का, अनुभूति विवेक, हृदय मन का
नश्वरता रहीं नियति इसकी, अति कोमल इसका हर मनका।
उत्तुंग शिखर पर्वत का हो, या सागर तल की गहराई
बढ़ता ही रहा, निज दृढ़ता से, चाहे कितनी ठोकर खाई।
बढ़ आया आज कहाँ मानव, अति उच्च सभ्यता कायम कर
लेकिन अपनी नासमझी से है खड़ा ध्वंस की सीमा पर।
यदि मानव बुद्धि के समक्ष ,गुण हृदय के ठुकराएगा,
तो सच है अपनी सृष्टि से ही चूर-चूर हो जाएगा।
जिद छोड़ भी दे नादान ना बन, बेसमझी की पहचान ना बन
उसकी सृष्टि को चलने दे, तू रचना है अपमान ना बन।
तू रचना है अपमान ना बन।
