रूह (आत्मा)
रूह (आत्मा)
1 min
412
तुझको हर बार ही जगाया है, जाग जा और सदा सुन मेरी।
फासले कुछ तो घटा ले आखिर, मैं घुट रहीं हूँ कैद में तेरी।
अपनी तनहाइयों को अपना ले, ये तेरे साथ-साथ जाएंगी।,
दिल की गहराइयों में झांका कर, आलम-एक-गम की दवा है तेरी।
रंग हर बार ही जुदा होंगे, तू जितना भी आगे जाएगा।
पर पहचान इन रंगों से कर, जिंदगी फिर गुलाम है तेरी।
अपने ज़ज्बातों पे नजर रखकर, चुन ले उनमें से फूल की मानिंद।
गर बहा इनकी धार में बेजां, खुशनुमा दिन भी रात अंधेरी।
तेरी खामोशियाँ गवाह होंगी, मेरी दुनिया के उजड़े गुलशन की।
ना भुला मुझको कर्ज की मानिंद, सुन ले मुझको मैं रूह हूं तेरी।
