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nirmala tyagi

Inspirational

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nirmala tyagi

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जगत जननी

जगत जननी

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हे विधाता !हूं जगत जननी ! मगर मजबूर हूं,

हूँ परम मैं पूज्य, पूजा से मगर मैं दूर हूं।

आरती होती मेरी आघात से प्रतिघात से,

तू छली जाती हमेशा मैं स्वयं की जात से।

बाप से भी पूर्व मेरी मां मुझे है मारती,

यह बड़ा इल्जाम सारी नारी शक्ति धारती।

है विवश वह मारने को, क्योंकि खुद मजबूर है,

आ रही मंजिल निकट फिर भी बहुत ही दूर है।

यह मिशन शक्ति मेरी परवाज का आगाज है

मैं बनूँ सक्षम सबल, इसका यही बस राज है।

हो रही है क्रांति सारे विश्व में चहूँ ओर से,

आज मैं हूं बढ़ रही, संक्रांति के दौर से।

कर रही प्रतिमान स्थापित, धरा पर प्रतिदिशि,

आ रही उजली किरण ढलती चली है अब निशि।

बढ़ चली हूं अब धरा पर, रोक कर देखे कोई,

दावानल सी फैलती जाती जो शक्ति थी सोई।

मेरे इस परवाज को प्रतिघात सहने है अभी,

पर रुकूँगी ना कहीं अब चाहे कुछ होवे कभी।

हे विधाता !हाथ तेरा बस यूं ही सिर पर रहे,

यह मनुजता पद दलित अब और ना मुझको करे।

यह मनुजता पद दलित अब होर ना मुझको करे।


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