STORYMIRROR

अमित प्रेमशंकर

Tragedy

2  

अमित प्रेमशंकर

Tragedy

मानव की मानवता

मानव की मानवता

1 min
350


मानव अपनी मानवता को 

खुद ही रौंदे जाते

अपनी महिमा अपनी गरिमा

 हद तक भूले जाते।।


चार दीवारी तोड़ी अपनी

घर भी अपना तोड़े  

मां बहनों की क्या इज्जत है

नहीं समझते थोड़े ।।


भाई है भाई का दुश्मन 

यह कैसी है नादानी

थोड़ी सी ख़ुशियों में मानव 

बन जाते अभिमानी।।


असत्य अहंकार के सागर में 

यह ऐसे बहते जाते 

अपनी महिमा अपनी गरिमा 

हद तक भूले जाते।।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy