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कवि काव्यांश " यथार्थ "

Abstract Tragedy Fantasy

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कवि काव्यांश " यथार्थ "

Abstract Tragedy Fantasy

माँ का दर्द

माँ का दर्द

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माँ का मौन दर्द

स्नेह का सागर, ममता की मूरत,

हर दुख सहती, फिर भी ना टूटे।

अपना सब कुछ अर्पण करके,

बच्चों के सपनों में रंग वो घोले।

नींद से पहले थपकी देती,

भूखी रह खुद, सबको खिलाती।

पर कोई उसका दर्द ना जानता      

सर्दी-गर्मी चुपचाप सहती

समय गुजरता, बच्चे बढ़ते,

नई दुनिया में खो जाते ।            

जो हाथ पकड़कर चलना सीखे,       

अब दूर कहीं हो जाते ।

माँ की आँखें राह निहारे,

कोई तो आकर पुकारे।

वो हँसती पर दिल रोता,          

खाली आंगन चुभता जाता ‌।

कोई ना समझे इस मौन पीड़ा को,

जो हर माँ ने जीवन में झेली।

ममता लुटाकर रह गई तन्हा,

बस यादों में ही दुनिया खेली।

ओ माँ! तेरा कर्ज़ है हम पर,

तेरी ममता का हम पर भार।

तेरी हँसी रहे सदा सजीव ,          

 न हो जीवन में कभी अंधकार।



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