STORYMIRROR

Shailendra Kumar Shukla, FRSC

Classics

4  

Shailendra Kumar Shukla, FRSC

Classics

लूट रहे हो फिर

लूट रहे हो फिर

1 min
252

लूट रहे हो फिर क्या सोचते हो 


नींद भी लूटी, चैन भी लूटा 

धन भी लूटा, जन भी लूटा 

मन भी टूटा, तन भी टूटा

टूट रहे हो, फिर क्या सोचते हो !


जब भी बोला, मन भी डोला 

जब भी तोला, कुछ ना बोला 

अब क्या लूटोगे जब हम सब ना 

अब क्या फटोगे जब सब तुम सा 

झूठ रहे हो, फिर क्या सोचते हो 


लूट रहे हो, फिर क्या सोचते हो !


अब तो सब धुंधला सा है 

अब तो सब संभला सा है 

जीवन भी देने वाले हो तुम 

वापस दे दें ये सोचते हो 

फूट रहे हो, फिर क्या सोचते हो 


लूट रहे हो, फिर क्या सोचते हो।


এই বিষয়বস্তু রেট
প্রবেশ করুন

Similar hindi poem from Classics