STORYMIRROR

Kavita Agarwal

Abstract

4  

Kavita Agarwal

Abstract

लोचन

लोचन

1 min
508


बड़े बेशर्म से हो गए हैं हम

शिकायत करते हैं हम

आराम नहीं है

रात भर जगते हैं


आंखों में जलन होने लगी है

रोशनी मोबाइल की चुभने लगी है

कल संडे है आज जल्दी सोने का दिन है

और कल देर से जगने का दिन है


शिकायत है सोना है आराम से

पर थकने के बाद भी नींद नहीं आ रही है सोने से

लगता है मोहब्बत हो गई है

अरे ठहरो ! कंक्लुजन में नहीं आना है,


फिर क्या हो गया ?

कहना है, मच्छरों से प्यार हो गया

ना मारना चाहते हैं उन्हें

ना दूर भेज पा रहे है उन्हें


मीठे हैं हम, इसलिए पीना चाहते हैं खून

चलो हम क्या करे खिड़की खोल देख लेते हैं मून

रात थम सी गई है

आंखों में नींद चढ़ने से लगी है


शायद ख्वाबों में कोई आए

पलकें झुका लेते हैं वह चले न जाए।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract