लड़की ------------
लड़की ------------
एक
लड़की
जब जन्मती है
किसी घर में
तो बनती है
किसी की बेटी-बहन
और इस तरह आरंभ होती है
उसकी जीवन यात्रा
उस घर और आँगन में
खेलते हुए बड़ी होती है
परवान चढ़ते हैं आंखों में
असंख्य सपने
बचपन जीते हुए अपना
कैशोर्य की दहलीज़ पर
रखती है कदम
युवावस्था पाते ही
बन जाती है घर और समाज की
चिंता का मुख्य कारण
जिस घर को समझती है वो अपना
उसी घर से बजती हैं
विवाह की शहनाइयाँ
रखती है कदम
अपने अनजान नए घर में
जीवन साथी के साथ
और आरंभ होता है जीवन का
दूसरा नया अध्याय
पत्नी बनते ही
वहाँ की ओढ़ लेती है
जिम्मेदारियाँ
कुछ कर्तव्य होते हैं निश्चित
कुछ स्वयं बुन लेती है
पत्नी और बहू के साथ
माँ बनती है तो
आरंभ हो जाता है
तीसरा अध्याय
घर बाहर
सास-ससुर
पति-बच्चे इन्हीं के चारों ओर
सिमटने लगता है जीवन
तब अपना जैसे कुछ
रहता ही नहीं
अपना अस्तित्व तक
सूझता नहीं
बच्चे बड़े हो जाते हैं
सब अपनी अपनी
रुचियों में मगन
इसी में जब
शरीर थकने लगता है और
कानों में तीर से गढ़ते शब्द
आसपास गूँजते हैं
होता नहीं तो छोड़ दो
दिखावा किसलिए
उस समय जीते हुए भी
जब अपनों के द्वारा
भावनाओं की हत्या होती है
उसका जिक्र
किसी गली, मोहल्ले, समाज
किसी अख़बार तक में नही होता
सबके होते हुए भी
अकेलेपन का दंश भोगती
खुश रहने का दिखावा करती है
उसी में खुशी ढूँढ़ती हुई
जीवन के चौथे अध्याय में प्रवेश कर
अपने में सब समाए रहती है।
