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संजय असवाल "नूतन"

Tragedy

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संजय असवाल "नूतन"

Tragedy

क्या से क्या हो गया

क्या से क्या हो गया

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क्या से क्या हो गया..!

कभी पीपल की छांव में 

ठंडी हवाओं के आगोश में 

धारा मंगरों का ठंडा पानी पी

मैं जी लेता था 

अपनी जिंदगी।

कोदा झुंगरा खा कर 

खेतों में हल चला कर

गाय बैलों को जंगल में चराकर 

मैं जी लेता था 

अपनी जिंदगी।

न बेसब्री थी

न पागलपन

मेहनत अपनी 

अपनी लगन 

मैं जी लेता था अपनी जिंदगी।

फिर एक दौर आया

सब छोड़ कर मैं शहर आया

खड़ा आज कंक्रीट के जंगल में

अकेला हैरान परेशान।

न चैन है 

न आराम 

अजीब सी हालत है 

न उगलते बनता ना निगलते।

क्या से क्या हो गया

अच्छे भले इंसान थे

कम खा कर सब्र करते थे

पर ये विकास हमे पागल कर गया।

सब छोड़ आए पीछे

अपना मन,

अपनी आत्मा,

अपना सुख,

अपना अस्तित्व भी

आज ये हाड़ मांस 

भीड़ हो गया है।

यहां न इंसान हैं 

न इंसानियत

जज्बातों को सूखे भी 

अरसा बीत गया

क्या से क्या हो गया।

जितने आगे बढ़े कदम

उतने पीछे छोड़ आए हम

अपनी मिट्टी

अपना गांव

अपनी संस्कृति 

और वो सुकून भरे दिन।

क्या से क्या हो गया

संवेदनों से परे

सूखे पत्ते की तरह

जड़ों से उखड़ा 

ठूंठ बन गया हूं मैं।

आज नजरों में अपने 

अजनबी हूं मैं

खुद से बेजार मगर 

कैद घर में हूं मैं

छोड़ कर आ गए सब मगर

दिल आज भी वहीं टूटे घर में है।



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