गज़ल
गज़ल
पांव में छाले लिए सहारा में हम चलते रहे।
जागती आंखों के सपने थे हमें छलते रहे।
निगलता सागर तटों को पूर्णिमा की रात में
ज्वार में तटबंध मोती सीप से झरते रहे।
गम से तपती लू चली गर्मियों में आंधियां।
तिनके तिनके घोंसले के शाख से गिरते रहे।
चोंच खोले सोन चिड़िया हांफती है छांह में।
सूखी नदिया के किनारे बिन मिले चलते रहे।
गर्मियों की धूप में जलता रहा नीला गगन।
पंछी फिर भी हौसले से तय सफर करते रहे।
