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संजय असवाल "नूतन"

Romance

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संजय असवाल "नूतन"

Romance

क्या लिखूं ...!

क्या लिखूं ...!

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क्या लिखूं

तेरी एक मुस्कराहट

देख कर मैं बस

खो सा जाता हूं।

क्या कहूं

तेरी मासूम अदा पर

मदहोश मैं बस

तेरा हो जाता हूं।

सोचता हूं 

सुलझाऊं तेरी उलझी लटों को

जिसमे मेरा दिल

बस उलझा रहता है।

थाम लूं

तेरे उड़ते आंचल को

जो भरी जवानी

तुझे ओढ़े रहता है।

लिख दूं 

दो आखर कुछ तेरे

मदमस्त नैनों पर

जो मुझसे शिकायत करते रहते हैं।

छूं लूं

तेरे गुलाबी होंटों को

जो एक अलग सा नशा

घोले रहते हैं।

खोल दे

बंद अपनी इन पलकों को

जो मेरे ख्यालों में ही

डूबे रहते हैं।

आ चले फिर

उन हंसीन वादियों में

जहां दो दिल 

मिलने को बेसब्र हुए रहते हैं।


 



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