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कवि धरम सिंह मालवीय

Inspirational

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कवि धरम सिंह मालवीय

Inspirational

कलम श्रृंगार छोड़ अंगार लिख

कलम श्रृंगार छोड़ अंगार लिख

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जब देश जले नफरत की आग में

जब बरसे लहू फागुन की फाग में

हो जब रुदन प्रलाप ही हर राग में

तब हर आतंकी का प्रतिकार लिख 

ये कलम श्रृंगार छोड़ अंगार लिख


राजनीति के इन छल छन्दों ने

देश में जिन्दा इन जय छन्दों ने

इनकी ही राजनीति चमकाने को 

अपनी वोटों की भूख मिटाने को

लगाया नफरत का बाजार लिख 

ये कलम श्रृंगार छोड़ अंगार लिख


हाँ जिसका खाया उनका न गाया

और अपनी माँ को आप लजाया

अधिकारों की ही मांग की खातिर 

जिसने अपना आज देश जलाया

उनको अब आतंकी सरदार लिख

ये कलम श्रृंगार छोड़ अंगार लिख


तलवार चलाकर बम फोड़ कर

देश भक्ति का वो चोला ओढ़ कर

संविधान की तो दे रही दुहाई वह 

खुद संविधान से ही मुंह मोड़ कर

कर्तव्य नहीं मतलब का संसार लिख 

ये कलम श्रृंगार छोड़ अंगार लिख


आतंक का भेष तुम्हें दिखाई नहीं देता

पुकारता देश तुम्हें सुनाई नहीं देता

वर्ष लगेंगे तुमको ये कलंक मिटाने में

मिनिट लगेंगे तुमको कानून हटाने में

जिद पर अड़ी धरम सरकार लिख

ये कलम श्रृंगार छोड़ अंगार लिख


सच सुनने की हिम्मत हैं तो डटो सामने

राजनीति करने वालों अब हटो सामने

अब इतिहास को ही बांच लिखूंगा मैं

बुरा लगे या भला बस साँच लिखूंगा मैं

सच को सच कहने का संस्कार लिख

ये कलम श्रृंगार छोड़ अंगार लिख


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