ख्याली पुलाव...???
ख्याली पुलाव...???
ख्याली पुलाव...???
मत खाना !! मत खाना !!
कभी मत खाना, ओ मेरे भाई !!!
उन ऊंची चोटियों पर बैठे
वक्त के ठेकेदार तुम्हें
उनकी पकाई हुई
'ख्याली पुलाव'
अक्सर परोसेंगे...
मगर सावधान !!!
वो पुलाव कभी
गलती से भी न खाना, ओ मेरे भाई...!!!
वरना तुम ज़िन्दगी भर
यही सोचकर पछताते फिरोगे
कि क्यों तुम इतनी आसानी से
उनके झांसे में आ गए...!
ये एक अजब
गोरखधंधा है,ओ मेरे भाई!
यहाँ ऊंचाई पर बैठे
वो नुमाइंदे
बस अपना ऊल्लू सीधा करने की
फिराक में रहते हैं...!
ये जान लो, ओ मेरे भाई!
तुम्हारी भलाई या विकास का
महज़ एक 'एजेंडा' ही
होगा उनके पास,
जो सिर्फ धूल भरी
फाईलों में बंद आखिर
भूले-बिसरे गीत बनकर
रह जाएंगे...!
वक्त-बेवक्त वो एहतियातन
उन फाईलों को
खोलेंगे-बंद करेंगे,
मगर एक ईमानदार
मजबूर इंसान की
हक़ीक़त की जद्दोजहद
उनके बंद कानों से होते हुए
उनके दिलों तक
कभी नहीं पहुंच पाएंगी...
और बाकी जो बचेगा,
वो बेरहम वक्त के
थपेड़ों से जूंझते-जूंझते
रफ्ता-रफ्ता खत्म हो जाएगी।
तो अब तुम ही ये तय करो
कि तुम्हें यूँ ज़िन्दगी भर
तमस को ही अपना
एकमात्र आधार मानकर
उसके पीछे
अंधीदौड़ लगाते फिरोगे
या उस अखण्ड सत्य की
प्रकाश-पुंज को
अपना सम्यक परिचय बनाकर
अपनी कामयाबी की लंबी राहों में
पूरे होशोहवास में
आगे बढ़ोगे...।
अब तो इस मिथ्या 'मायानगरी' से
बाहर निकलो...!!!
अब तो थोड़ा अपने बारे में भी
सोचो, ओ मेरे भाई...!!!
वरना इस दुनिया से अपना
असली हक़ लिए बिना ही तुम
एक दिन अचानक
उस अनछुई दुनिया में
रुखसत हो जाओगे...!
क्या महज़ तुम्हारी ख्वाहिशों की
तस्वीर पर दिखावे की
फूल-मालाएँ चढ़ाने से
तुम्हें अपनी लूटी हुई वो हर खुशी
मिल जाएगी
जिसकी तुम बड़ी बेसब्री से
कभी इंतज़ार
किया करते थे???
उठो !!! जागो !!!
अपने टूटते ख्वाबों को
बचाओ, ओ मेरे भाई...!!!
अब तो उन ऊंची चोटियों पर बैठे
वक्त के ठेकेदारों की पकाई हुई
'ख्याली पुलाव' से तौबा करो, ओ मेरे भाई!!!
वरना तुम्हारा पाचनतंत्र हमेशा के लिए
नष्ट हो जाएगा!!!
