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Meeta Khurana

Abstract

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Meeta Khurana

Abstract

ख्वाब

ख्वाब

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एक ख्वाब रखकर

भूल गई कही

यहाँ

नहीं नहीं


रखा तो था यही कही

सारी रात बीत गई उसको

अँखियों तक लाने में

पराया था क्या वो ?


अजनबी तो नहीं था कही ?

महसूस जिसे किया था

दिल के करीब


खो गया वो ही

सरककर यहीं कहीं।


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