खुद को यूं हताश न कर
खुद को यूं हताश न कर
अंतर्मन की ध्वनि अनसुनी कर हर बार समझौता किया है,
खुद को भुलकर, उम्रभर ये किरदार औरों के लिए जिया है,
बिखर गए जिसके ख़्वाब सारे अरमान कहीं दफ़न हो गए,
आज तन्हा जो शख़्स, हर कोई उसी से सवाल कर रहा है,
उम्र के इस मोड़ पर आकर उसने पीछे मुड़कर देखा जब,
ज़िन्दगी पूछ ही बैठी उससे क्या तूने अपना हाल किया है,
ज़िन्दगी सुना रही है आज, एक ज़िन्दगी की खुली दास्तां,
तो सुनो उस शख़्स की कहानी, जो दिल खोल कर बैठा है,
कुछ ना कहो रो लेने दो आज मुझे कि आत्मा नम है मेरी,
कैसी किस्मत पाई आज फिर कोई अपना मुझसे रूठा है,
जितनी भी कोशिश कर लूँ मैं, किस्मत बदलती नहीं मेरी,
ज़िंदगी ने भी तो मुझसे बगावत कर, हर बार मुझे ठगा है,
सहेजा था, संभाला था, अपनों को साथ लेकर आगे बढ़ा,
पर रेत की तरह हर रिश्ता, एक-एक कर हाथों से छूटा है,
किस्मत की रूठी हुई लकीरों में, भर न सका कोई भी रंग,
हर पल यहाँ मैंने, खुद को खुद से ही बिछड़ते हुए देखा है,
किसे दूँ इल्ज़ाम मैं, जब मेरे नसीब में ही, हैं खुशियाँ नहीं,
जिस मोड़ को अपना समझा, वहीं मिला मुझको धोखा है,
फूंक फूंक बढ़ाया हर कदम, कांटे चुभे, कितने ज़ख्म मिले,
बस एक आस में ये दिल मेरा ना जाने कितनी बार रोया है,
हाल-ए-दिल कर सकूँ बयां, न कोई पड़ाव है, न ठिकाना,
कोई पूछे तो इस दिल से, जिसमें पाकर सब कुछ खोया है,
आज नम आँखों से, बीते लम्हों की महफ़िल सजा रहा हूँ,
जिसने आज भी इस दिल को एहसासों से बाँधकर रखा है,
चाहा लौटना अपनों के पास, पर कोई राह नज़र ना आए,
रूठा नसीब रूठी ज़िन्दगी, किस्मत ने खेल कैसा खेला है,
खुशियाँ समेटने की चाहत में, दर्द ही समेटता रहा उम्रभर,
अब तो आस लगी है टूटने, खुद से विश्वास भी उठ गया है,
हाल-ए-दिल सुनकर, बोली ज़िंदगी तू तन्हा नहीं सफ़र में,
तू खुद का ही साथी बन आगे बढ़, देख हर रास्ता खुला है,
जो तन्हा कर गए तुझे, वो कभी तेरी किस्मत में थे ही नहीं,
शायद नसीब ने तेरे लिए कुछ बेहतर और ही रख सोचा है,
यूँ हताश न कर खुद को, जो तेरा है तुझे मिलकर ही रहेगा,
तेरे ज़ख्मों का मरहम भी, किसी न किसी मोड़ पर रखा है,
भूल जा जो भी हुआ पीछे मुड़ कर भी क्या ही देखना अब,
याद रख ये सफ़र खुद का साथ सच्चा बाकी सब धोखा है।
