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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Tragedy

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Tragedy

कहीं धूप कहीं छांव

कहीं धूप कहीं छांव

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कहीं धूप कहीं छाया प्रभु तेरे मन मे है क्या समाया ??


कहीं कोई खाली पेट सोता है तो कहीं कोई भूख के लिए रोता है।

कहीं नींद नर्म गद्दे मे भी ना आती तो कहीं कंकड़ पत्थर की सेज सज जाती । 


कहीं लाल(रत्न अमीर)के लाल(बेटा) ही लाल(क्रोधित)हो जाते हैं ।

झोपड़ी में बसे जो वे भी तो गुदड़ी के ही लाल कहाते हैं ।


कहीं तन ढकने को नहीं होते हैं वसन

तो कहीं फैशन में तन होता है नगन ।


कहीं ममता तड़पती है बच्चे के लिए 

तो कहीं बच्चे तरसते हैं मां की ममता के लिए ।


राम तेरी माया कहीं धूप कहीं छाया जाने क्या तेरे मन में है समाया ?

      



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