STORYMIRROR

ZEBA PARVEEN

Tragedy

3  

ZEBA PARVEEN

Tragedy

ख़ौफ की बस्ती

ख़ौफ की बस्ती

1 min
356

मौसम के मिज़ाज बदलते

कई सारे नये याद बनते

इस शहर के जब ख्यालात बिगड़ते

तब हर मासूम से दिल सहमते 

डर-डर के जीते लोग यहाँ

सच को झूठ और झूठ को सच में बदलते 

लोग यहाँ, कीमत नहीं रहीं ईमानदारी की

हर तरफ गूँज अब बेईमानी की

वाह वाही होती चोर बेईमानों की

नहीं मोल नहीं, नेक वफ़ादारों की

सीधे सच्चो को मनाते हैं, दगाबाज़

झूठों को बनाते हैं, अपना सरताज़

हैं ख़ौफ की बस्ती ये हैं, मुल्क आज़ाद

पर फिर भी ख़ुद से हर एक गुलाम ।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy