Neerja Sharma
Tragedy
खामोशी मेरी
अगर तुम पढ़ लेते
तो शायद
मैं कभी खामोश ही ना होती,
अपनी बात
जो कह ना पाई
अपनी खामोशी
मन ही मन में बसाई ,
यह खामोश रहना
नहीं था इतना आसान
मुझे था .....
बस यही इंतजार
शायद ......
तुम पढ़ लो मेरी खामोशी !~
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अपनाते भले न हो मुझे पर मेरी बद्दुआओं से तो हैं डरते ! अपनाते भले न हो मुझे पर मेरी बद्दुआओं से तो हैं डरते !
लो अग्नि संस्कार किया स्त्री विमर्श में अपने हाथों से लिखें पृष्ठों का। लो अग्नि संस्कार किया स्त्री विमर्श में अपने हाथों से लिखें पृष्ठों का।
वो सुबह कुछ अलग सी थी कुछ धुआं रेत बारीक सी थी। वो सुबह कुछ अलग सी थी कुछ धुआं रेत बारीक सी थी।
राजनीति सुविधा हुई ,बनी आज व्यवसाय। मीठा-मीठा गप्प सब, कड़वा थूकत भाय।1। राजनीति सुविधा हुई ,बनी आज व्यवसाय। मीठा-मीठा गप्प सब, कड़वा थूकत भाय।1।
क्या तुम अपने घर में मेरा अपना घर दे पाओगे। क्या तुम अपने घर में मेरा अपना घर दे पाओगे।
गाँव की गलियों से जब जब गुजरा हूँ मैं पथ की बेरियों को उकेरा है मैंने। गाँव की गलियों से जब जब गुजरा हूँ मैं पथ की बेरियों को उकेरा है मैंने।
मैं तो एक वैश्या हूं, और वैश्या ही कहलाऊंगी जिस्म बेचकर ही, खुद को जिन्दा रख पाऊंगी। मैं तो एक वैश्या हूं, और वैश्या ही कहलाऊंगी जिस्म बेचकर ही, खुद को जिन्दा रख ...
अपना पट शीघ्र न खोलूँगी कुछ मुझको तो मनाये वो अपना पट शीघ्र न खोलूँगी कुछ मुझको तो मनाये वो
जिंदगी में भरी निराशाओं में एक नई आशा का उजाला दिखा तो था। जिंदगी में भरी निराशाओं में एक नई आशा का उजाला दिखा तो था।
कितने तो आँसू बहे होंगे इन आँखों से, घर ये खारे पानी का। कितने तो आँसू बहे होंगे इन आँखों से, घर ये खारे पानी का।
बड़ा खामोश लम्हा है इन चुप्पियों के दौरान भी। बड़ा खामोश लम्हा है इन चुप्पियों के दौरान भी।
'जीवधारी देश', ख़ुद को मानते हैं राज, सत्ता सब बदलना चाहते हैं। 'जीवधारी देश', ख़ुद को मानते हैं राज, सत्ता सब बदलना चाहते हैं।
ढह रही भरोसे की कच्ची दीवारें, क्यूँ कि बुनियाद ही शक पर बनी थी। ढह रही भरोसे की कच्ची दीवारें, क्यूँ कि बुनियाद ही शक पर बनी थी।
और कर रहे हैं शर्मिंदा सच को, झूठ के झुंड में। और कर रहे हैं शर्मिंदा सच को, झूठ के झुंड में।
पराई भाषा को दिया मान,, अपनी भाषा को माना कूड़ेदान। पराई भाषा को दिया मान,, अपनी भाषा को माना कूड़ेदान।
जीवन इतना सरल नहीं जीवन इतना सरल नहीं
टूट गई मन की गागरिया टुकड़े झोली भरती। रंगहीन ले...य़ टूट गई मन की गागरिया टुकड़े झोली भरती। रंगहीन ले...य़
सड़क काली हो या भूरी जहां से भी निकलती है स्याह कर देती है। सड़क काली हो या भूरी जहां से भी निकलती है स्याह कर देती है।
आज फिर तेरे तसव्वुर ने नींद को इन आँखों से रूख़्स्त किया है। आज फिर तेरे तसव्वुर ने नींद को इन आँखों से रूख़्स्त किया है।
किन्तु, ख़ुद ख़त्म होने से पहले ही, पहुँच में उसके दूसरी कुर्सी। किन्तु, ख़ुद ख़त्म होने से पहले ही, पहुँच में उसके दूसरी कुर्सी।