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chandraprabha kumar

Romance Tragedy

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chandraprabha kumar

Romance Tragedy

कहा था तुमने

कहा था तुमने

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कहा था तुमने,

मुग्ध मन से विश्वास किया था,

पर वह दिन कभी न आया। 

प्रतीक्षा रत रही मैं। 


सम्पर्क तुमने जोड़ा,

फिर दूर हुए,

अपनी मर्ज़ी से आये ,

अपनी मर्ज़ी चले गये। 


मैं टूटे सपने लिये,

भग्न आशा लिये ,

इन्तज़ार करती रही,

जो कभी ख़त्म नहीं हुई। 


तुम दूर चले गये,

यहॉं तनहा मैं 

यादें भी नहीं हैं 

है केवल छले जाने का ग़म। 


तुमने आसानी से भुला दिया,

कभी कुछ कहा था,

कोई सपना दिखाया था,

जो सपना ही रह गया। 


कहीं से कोई कहता है,

अभिमानिनी,

छलकर तृषा बुझाने का

यह तो बहाना पुराना था।


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