STORYMIRROR

Akanksha Gupta (Vedantika)

Abstract

3  

Akanksha Gupta (Vedantika)

Abstract

कह रही हूँ बहुत कुछ

कह रही हूँ बहुत कुछ

1 min
245

कह रही हूँ बहुत कुछ

मगर तुमसे नहीं खुद से


नहीं डाल रही मैं व्यवधान

तुम्हारी तन्हाई में अब


चल पड़ी हूँ मैं भी अब

एक तन्हा रास्ते पर


अकेले ही लेकिन अब

कह रही हूँ बहुत कुछ

मगर तुमसे नहीं खुद से।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract