STORYMIRROR

Sahil Hindustaani

Abstract Romance Fantasy

3  

Sahil Hindustaani

Abstract Romance Fantasy

कभी आओ...

कभी आओ...

1 min
234

कभी आओ हमारे भी दर पे

ख़्वाबों के दर पे तो तुम रोज़ ही आती हो

माहताब़ देखने को क्यूँ कहती हो हमें

जब उससे ज़्यादा नूर तुम लुटाती हो

अपनी मासूम हँसी अल्हड़ सा चेहरा लेकर आओ

अपने फ़लसफे के लिए क्यों हमें तड़पाती हो


ग़ज़लें लिखनी नहीं आती तुम्हें कहती तो हो

फिर अदाएँ दिखाकर अपनी क्यूँ मुझसे लिखवाती हो

साहिल भी है मिलने लायक़ जानती हो तुम

फिर क्यूँ दूर दूर रहकर उसे तरसाती हो...

कभी आओ हमारे भी दर पे

ख़्वाबों के दर पे तो तुम रोज़ ही आती हो

माहताब़ देखने को क्यूँ कहती हो हमें

जब उससे ज़्यादा नूर तुम लुटाती हो


अपनी मासूम हँसी अल्हड़ सा चेहरा लेकर आओ

अपने फ़लसफे के लिए क्यों हमे तड़पाती हो

ग़ज़लें लिखनी नही आती तुम्हें कहती तो हो

फिर अदाएँ दिखाकर अपनी क्यूँ मुझसे लिखवाती हो

साहिल भी है मिलने लायक़ जानती हो तुम

फिर क्यूँ दूर दूर रहकर उसे तरसाती हो


फ़लसफे - दर्शन


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract