STORYMIRROR

Komal Kamble

Abstract Tragedy Inspirational

3  

Komal Kamble

Abstract Tragedy Inspirational

कब तक पुकारूं

कब तक पुकारूं

1 min
210

कब तक पुकारूं मैं तुम्हें

अब तो मुझसे मेरी सांसे भी बिछड़ने लगी है

पर मानी ना है मैंने अब तक हार

क्योंकि जिंदा अब तक आशाओं का मंजर है


कब तक पुकारूं मैं तुम्हें

तुम जो मानवता के पुतले बन खड़े हो

मदद की जरूरत है तुम्हारी

पर तुम अंंजान जो बनें बैठे हो


कब तक पुकारूं मैं तुम्हें

अब तो मेरी पुकार भी चीखने लगी है

क्या कहूं मैं अब तुम्हें

तुम्हारी आत्मा जो खोखली हो चुकी है


अब नहीं पुकारूंगी मैं तुम्हें

क्योंकि मेरी सांसे अब रुक चुकी है

पर अब आत्मा मेरी कहेगी तुमसे

कब तक पुकारूं मैं तुम्हें



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract