कौन पूछता है
कौन पूछता है
दरख़्तों के सूख जाने पर तो परिंदे भी उड़ जाया करते हैं।
स्याही ख़त्म होते ही अक्सर कलम भी फेंक दिए जाते हैं।।
पुष्प भी तब तक ही लुभाते जब तक खुशबू से भरे खिले।
सूख जाने पे तो ये भी बेकार समझकर फेंक दिए जाते हैं।।
फिर यह तो दुनिया है यहाँ कौन पूछता किसी को बेवजह।
मतलब पूरा होने पर तो पहचानने से भी इंकार कर देते हैं।।
जब तक किसी के काम आ रहे हैं होती है सौ प्रतिशत पूछ।
फिर यही अपने जीवन में हमारी अहमियत शून्य कर देते हैं।।
खैरियत भी पूछा करते हैं तभी तक बस जब तक है स्वार्थ।
बाद इत्तफाकन मिल भी जाओ अजनबी से हो निकलते हैं।।
माना हर कोई नहीं होता मतलबी यहाँ कुछ है नेक दिल भी।
जो अजनबी होकर भी इस दुनिया में हमें अपने से लगते हैं।।
खुदगर्जी की भीड़ लगी है जहाँ सौम्यता आखिर कैसे दिखे।
नेक दिल ही अक्सर यहाँ स्वार्थ की लपेट में आया करते हैं।।
कौन पूछता है इस प्रश्न को ही मन मस्तिष्क से निकाल फेंको।
क्योंकि ऐसे प्रश्न ही तो निराशाजन्य विचारों को जन्म देते हैं।।
पृथक कर देते हैं सूखने पर वृक्ष भी तो पत्तों को टहनियों से।
रिवाज है यही इस दुनिया का हम कैसे आखिर भूल जाते हैं।।
सोचना ही क्यों कौन पूछता कौन नहीं तुम स्वयं को ही पूछो।
फर्क तो वहांँ पड़ता है जहाँ दुनिया से उम्मीद ज़्यादा रखते हैं।।
जिंदगी का सफ़र वैसे भी सभी को अकेला ही तय है करना।
वजूद खो देते हैं वो जो दुनिया के लिए खुद को बदल देते हैं।।
