कैसे-कैसे
कैसे-कैसे
ये सारा ज़माना साखी बस ऐसे ही है
ऊपर से श्वेत, भीतर बगुले जैसे ही है
जो दिखता है, वो कभी होता नहीं है
हर चमकता पत्थर हीरा होता नहीं है
भरा दरिया कभी छलकता नहीं है
फूल गुलाब का कभी रोता नहीं है
सब लोग दिखावे करते कैसे-कैसे है
भीतर से उनके घर टूटे कैसे-कैसे है
बाहर पहनते लोग चमकीले कपड़े,
भीतर पहनते गंदे विचारों के कपड़े,
लोगों के मन कृष्ण वर्ण से मैले है
देख श्याम वर्ण रोता सागर जैसे है
न दया, न रहम करते कर्म कैसे-कैसे है
पलते भीतर आज कीड़े कैसे-कैसे है
सुधर न रहा मनु, भीतर गया झूठ अणु,
लोग सच को बना रहे झूठ के पैसे है
पर साखी रोशनी तो दीये से ही होती है,
अंधेरे से तो सदा कालिमा ही होती है,
रास्ते मिलते है, गर हम खोजते है तो,
पत्थर चाहे मिलते हिमालय जैसे है
